आ अब लौट चलें…
परिवर्तन का नाम ही जीवन है…
प्रत्येक दिन हम परिवर्तनों के नए नए दौर से गुजरते हैं.
छींटें और बौछारें को भी परिवर्तन के इस दौर से गुजरना है.
इस परिवर्तन की नींव शायद पहले ही पड़ चुकी थी - या शायद नियति ही थी. संबल मिला सृजनशिल्पी व रमण के लेख व टिप्पणियों से.
छींटें और बौछारें का जीवन यहीं तक था शायद.
अब से ‘छीटें मय’ और ‘बौछारें युक्त’ नई प्रविष्टियाँ मेरे पुराने चिट्ठा स्थल - ‘रविरतलामी का हिन्दी ब्लॉग’ पर उपलब्ध होंगी.
दरअसल, इस परिवर्तन की वजह है - मेरे द्वारा अपने लेखन को पूर्ण व्यवसायिक रूप देना. हिन्दिनी के वर्तमान फ़ॉर्मेट में व्यावसायिकता की जगह नहीं है. अतः दुःखी मन से और मन मारकर यह कदम उठाना पड़ रहा है. भाई ईस्वामी को बहुत बहुत धन्यवाद कि उन्होंने छींटें और बौछारें को लंबे समय तक होस्ट कर मेरे लेखन को संबल प्रदान किया. हर एक की अपनी प्रतिबद्धताएँ होती हैं, और हम सभी को अपनी प्रतिबद्धताओं के साथ चलना ही चाहिए.
मैंने पिछले दिनों ही कहा था - हिन्दी में भी कई अमित अग्रवाल हो सकते हैं. हममें से कुछ को तो शुरूआत करनी ही होगी. मैंने शुरुआत कर दी है. देखते हैं सीढ़ी कहाँ तक ले जाती है. व्यावसायिकता में हिन्दी पीछे क्यों रहे? देसीपंडित हर किस्म के उपाय करे और नारद जी मिर्ची सेठ पर भार बने रहें? ऐसा कब तक चलेगा? क्या हिन्दी की साइटें और ब्लॉग स्ववित्त पोषित नहीं बन सकते? बिलकुल बन सकते हैं. पर, उपाय तो हमें ही करने होंगे. अपने भीतर के इनहिबिशन को, संकोच को त्यागना होगा और पूरी व्यावसायिकता अपनानी होगी. तब आने वाला समय निश्चित ही हिन्दी का होगा.
तो, दोस्तों, अब से मेरे चिट्ठामय ‘छींटें और बौछारें’ मेरे पुराने चिट्ठा स्थल - रविरतलामी का हिन्दी ब्लॉग पर उड़ा करेंगे. नियमित, प्रतिबद्ध और पूर्ण-व्यावसायिक. मनोरंजन और जानकारी से भरपूर. शुरुआत हो चुकी है. आज का ताज़ा चिट्ठा पढ़ें.
निरंतर का पुनर्जीवन