भारतीय लोग इतने बेवकूफ़ क्यों हैं?

मैं एक अनिवासी भारतीय - या जैसे की तोहमत दी जाती है एक नान-रिलाएबल इंडियन हूं. लगभग एक दशक से भारत से बाहर हूं - हिंदी में ब्लाग लिखता हूं तो कहीं खालिस भारतीय ही हूंगा ना - इसीलिये बहुत दु:ख के साथ पूछना पड रहा है अपने भारत में रहने वाले भाईयों-बहनों से की आप(और हम) इतने बेवकूफ़ क्यों हैं? 

हम क्या चाहते हैं और क्यों ये हमें नही पता होता लेकिन जो भी हो रहा होता है उस पर ३६५ दिन मुहर्रम मनाना ज़ारी रहता है. फ़िर भी हमारी पश्चिमोन्मुखी नकलची प्रवृत्तियों पर कभी समझदारी की कोई नकेल नहीं डलती.

इन्टरनेट युग में आप पश्चिम की गलतियां क्यों दोहरा रहे हैं? आखिर क्यों? आगे क्या होगा क्या आपको इसका भान भी है?

हाल के टीवी कार्यक्रमों और ब्लाग-रंगेजीयों के मद्दे नजर दो मुद्दों पर बात करनी है - १. क्रिकेट और २. औरतें!    

१. भारत की प्रोफ़ेशन क्रिकेट लीग्स के मुद्दे पर -

एक समय था जब भारतीय लोग इस बात पर रोते थे की भारत की सरकार खेलों को प्रोत्साहित नही करती. खेल सुविधाओं का अभाव, खिलाडियों की दुर्दशा जैसे मुद्दे भी पुराने पड गए. कुछ नहीं हुआ. अब बाज़रवाद का जोर है और १३ घोडों से जुती सरकार कमजोर है.

फ़िसड्डी भारत में खेल अब एशियाड या ओलम्पिक में पदक जुगाडने की चीज़ नहीं है - वो तो होने से रहा, ये मनोरंजन है - टाईमपास. जैसे राजपूत आपस में ही लडाई-लडाई खेलते थे और बाहर वाले से पंगा नहीं लेते थे वैसे ही अपन देसी क्रिकेट की टीमें बना बना के २०-२० खेलने का प्लान है! तो क्या गलत है? आन-बान भी बनी रहेगी और चैंपियन भी तो कोई अपने वाला ही बनेगा ना - कित्तों को रोजगार मिलेगा सोचो!

लेकिन छाती-कूटा लॉबी सक्रीय है - राग ये है की खेल नहीं है धंधा है - खिलाडी नहीं है उत्पाद है. खेल भी एक व्यवसाय है यह सच है तो फ़िर इतना बवाल क्यों? खिलाडियों का तो भला ही हो रहा है और खेलों का बाज़ार बढ रहा है - बिल्कुल पश्चिम की तर्ज पर. अगर कुछ नहीं बढ रहा है तो वो है राष्ट्रीयता और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा वाले खेलों में भारतीय खिलाडियों की विश्वस्तरीयता हां इस मुद्दे पर कोई टीवी चैनल रोता हुआ नहीं दिखता! सौ- दोसौ क्रिकेटर करोडपति हो जाएंगे इस पर हौल जरूर पड रहे हैं. टीवी चैनलों पर फ़िलासाफ़ियां दी जा रही हैं. हमारे मीडिया की प्राथमिकताएं क्या हैं? उसके ओछेपन पर हम क्यों शोर नहीं मचाते!?

हमेशा की तरह एक बार फ़िर हमारी प्राथमिकताएं बेतरतीब हैं माना लेकिन कुछ खिलाडियों का ही सही, भला तो हुआ! एक खेल का ही सही कुछ बाजार तो बढा. मुझे तो इसमें कुछ गलत नहीं दिखाता. आर्थिक दुर्दशा से जूझते खिलाडी या संपन्न खिलाडी क्या बेहतर है? और आगे दूसरे खेलों पर भी इस बाजारवाद का असर होगा ये तो खुशी की बात है! हम हर वक्त शिकायती मुद्रा में क्यों होते हैं?

२. भारतीय नारी के मुक्तिराग पर -

आजकल बहुत कुछ पेला जा रहा है इस पर. मोटे तौर पर कुछ कहना चाहता हूं - अगर मेरे हर शब्द को पकड पकड कर घसीटने के बजाय जो कह रहा हूं वो समझने का प्रयास किया जाए -

A feminist is a woman who does not allow anyone to think in her place.

लेकिन भारतीय स्त्रियों ने अपने लिये सोचने का ठेका पश्चिमी नारियों को दे दिया लगता है! उन्ही की तर्ज पर आपको नारीवादी होने के लिये पुरुष-विरोधी होने की जरूरत क्यों पडती है?

पश्चिमी नारी नें बराबरी का नारा बुलंद किया - वोट देने का अधिकार, न्याय का अधिकार, समान वेतन का अधिकार वो सब भारतीय नारी के पास कानूनी रूप से सुरक्षित ही है. 

इसके आगे सामाजिक स्थिती के मामले में भारतीय नारी क्या चाहती है खुद उसे नहीं पता! वैसे उसका भविष्य कितना अंधकारमय है इसकी जानकारी भी उसे नहीं है.

पश्चिमी शैली की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का नारा बुलन्द करती वर्किंग वुमन हो चुकने, आर्थिक स्वतंत्रता, समानता के नाम पर कुछ हद तक चारित्रिक स्वछंदता आदी के लिये चिल्ल-पों करती वीरांगनाओं को अपने से तीस-पैंतीस साल या २-३ पीढियों पहले यही सब कर चुकी पश्चिमी महिलाओं का हश्र देखना चाहिए!

आज पश्चिमी समाज में ४५% से अधिक विवाहों की परिणिती तलाक है. एकल मां-बाप की संतानें एक सुविधा संपन्न स्वार्थी समाज में अपने स्वास्थ्य और अपनी कमाई के अलावा किसी और चीज़ के बारे में सोचते हैं और ना किसी और पर भरोसा ही कर सकते हैं. अमरीका में हर साल १.९ मिलियन लोगों को डिप्रेशन या अवसाद की शिकायत होती है जिनमें महिलाओं का प्रतिशत अधिक है. ऐसा क्यों है? 

मेरा एक मित्र कहता है “पश्चिम की औरत, औरत नहीं है - वो मर्द की एक किस्म है चाहे कितनी नारीवादी बने!”

अपने सहज औरतपन से मर्दों को समझदारी सिखा सकने के बजाए आज भारतीय नारी भी मर्द की एक किस्म हुआ चाहती है और हो कर रहेगी! कोई शक नहीं है. लेकिन ज्वलंत विचारों वाली आपकी सफ़ल कार्पोरेट विरांगनाओं, आपकी सुपुत्रियों के लिये दुल्हे मिलना मुश्किल होंगे क्योंकी भारतीय पुरुष भी पश्चिमी पुरुषों के समान औरत को “बिच्च” कह कर बुलाएंगे और उपभोग की वस्तु समझेंगे और उनसे विवाह करने से बचना चाहेंगे! ये नंगा सच है. यह पश्चिम की त्रासदी है! और हां पश्चिम की स्त्री “बिच्च” कहा जाने पर गर्व महसूस करती है की वो हर मामले में अपनी हांक कर पुरुष को इतना कुढा चुकी है! तो सचमुच बहुत मेहनत से पाया गया ओहदा है!!

I’m tough, I’m ambitious, and I know exactly what I want. If that makes me a bitch, okay. - Madonna Ciccone

मित्र कहते हैं की “मुद्दा ये था की  औरत फ़ेमिनिस्म के नाम पर ही सही मर्द की एक किस्म तो होना चाहती रही है लेकिन हम मर्दों की निगाह में वो अच्छे वाले मर्दों की एक किस्म नहीं हो सकीं - कुछ मिस्टिरियस मामला है!”

मुझे अमरीकी लडकियों से डील करने के सीक्रेट गुर दिये गए - “तुम किसी अमरीकी लडकी से ढंग से व्यव्हार करो तो वो तुम पर मूत कर चली जाएगी .. उसे जताओ की तुम उसे हिकारत की नज़र से देखते हो तो पीछे पीछे आएगी की मैं दूसरियों जैसी नहीं हूं!” ये मनोविज्ञान है.. मीर की गजलें सुनने वाले कानों के लिये जरा हट के ज्ञान था ये!

वैसे अगर पश्चिम का अंधानुकरण ज़ारी रहा तो आनी वाली पीढी के भारतीय बाप अपनी स्वछंद बालाओं को रईस लडके फ़ंसाने की सलाह देंगे. ऐसे में हर आदमी ये सोचेगा की औरत उससे पैसे की खातिर जुडी है और औरत ये सोचेगी की मर्द उससे देह की खातिर जुडा है. फ़िर दोनो संतुलन सिद्ध करने चल पडते हैं. ऐसे असुरक्षित समाज में औरत ये सिद्ध करना चाहती रहेगी की वो आत्मनिर्भर है और मर्द ये सिद्ध करना चाहता रहेगा की वो चिरयूवा है, तो वियाग्रा और डिप्रेशन की गोलियां बिकना लाजमी है - ये है पश्चिमी असुरक्षा - जिसकी जडें तथाकथित स्त्री सशक्तिकरण में छुपी हैं! गोलियां प्रेम और समर्पण का स्थान नहीं ले सकतीं.

आज बहुधा पश्चिमी औरतें कहती है की स्त्री सशक्तिकरण का मुद्दा आत्मघाती छलावा सिद्ध हुआ है! ना खुदा ही मिला ना विसाल-ए-सनम! कुछ औरतें मानती हैं की वे अति कर चुकी हैं. 

भारतीय स्त्री जिस संतुलन को साध सकती है उसे पश्चिमी स्त्री नहीं साध सकी थी - वो एक साथ भारतीय पुरुष को उसकी कुंठाओं से मुक्त कर सकती है और सहचरी भी हो सकती है - इतनी समझदारी और रचनात्मकता है उसमें - लेकिन ये तीस-चालिस साल पुरानी फ़ेमिनिस्ट लेखिकाओं के पद-चिन्हों पर चल कर नहीं होगा!

भारतीय वीरांगनाओं को सूचित कर दूं की पश्चिमी feminism वास्तविकता में औंधे मूंह गिर चुका है (यह आसान कडी बहुमूल्य है) और उसके साथ-साथ आधा समाज भी - संपन्न लेकिन मूल्यहीन हुआ समाज! ये आवलोकन एक पुरुष होने के नाते नहीं - अमरीका में एक दशक से रह रहे भारतीय होने ने नाते दे रहा हूं! जरा इन्टरनेट तो खंगालिये!

मैं सचमुच भौंचक्का हूं की अन्धानुकरण के चलते भारतीय इनकी बेवकूफ़ियों को क्यों दोहराना चाह रहे हैं रहे हैं? इत्ता कडवा सच पिला दिया - नान-रिलाएबल लग रहा हूं?? 

Popularity: 19% [?]

18 Votes | Average: 3.89 out of 518 Votes | Average: 3.89 out of 518 Votes | Average: 3.89 out of 518 Votes | Average: 3.89 out of 518 Votes | Average: 3.89 out of 5 (18 votes, average: 3.89 out of 5)
Loading ... Loading ...

Latest comments across all posts

Recent Posts

post पाकिस्तान: कुछ नहीं आसान!

1 Votes | Average: 3 out of 51 Votes | Average: 3 out of 51 Votes | Average: 3 out of 51 Votes | Average: 3 out of 51 Votes | Average: 3 out of 5 (1 votes, average: 3 out of 5)
Loading ... Loading ...
Popularity: 16% [?]

तो वो घडी आ गई.. पाकिस्तान में गठबंधन सरकार बनना लगभग सुनिश्चित हो गया है!

मैंने अपने एक लेख में यह पहले भी कहा था -

राजीव की हत्या के बाद से आजतक हमारे पास स्पष्ट बहुमत वाली सरकारों का नितांत अभाव रहा है! गठबंधन सरकारों की अंदरूनी राजनीति देश को तरक्की नही करने देती. शक्तिशाली नेता के अभाव में तंत्र को भ्रष्ट रखना आसान होता है.

पाकिस्तान में लोकतंत्र लाने की कोई जल्दी नहीं है और अगर पाकिस्तान में लोकतंत्र आ भी जाता है तो भी टूटा-फ़ूटा आध-कचरा होगा. ऐक ऐसा तंत्र जिसमें कोई भी इतना शक्तिशाली ना हो की जनता को हांक कर कोई काम पूरी तरह सिरे लगवा ले. हमेशा विघ्नसंतोषियों को खिलौना बना कर काम में लाया जा सके. बडी सुविधाजनक स्थिती होगी!

जिस देश में मुशर्रफ़, दाऊद, ओसामा बिन लादेन और नवाज़ शरीफ़ आराम से विचरण कर सकते हैं वहां पर बेनज़ीर को बडी सफ़ाई से भेज कर साफ़ करवा दिया जाता है. उसको मरने के लिये ही भेजा गया था! अब पाकिस्तान के पास कोई राष्ट्रीय पार्टी का कद्दावर नेता नहीं होगा.

अगर मुशर्रफ़ ने सीधे सीधे अपना पद नहीं छोडा तो क्या उनका हश्र भी वही होगा जो बेनज़ीर का हुआ?

मुद्दे की बात तो ये है की क्या पाकिस्तान में सरकारें बदलने के बाद पाक-प्रायोजित आतंकवादी कार्यक्रमों में कोई कमी आएगी?

भारत पर  अपने परमाणु प्रतिरक्षा उपायों के कार्यक्रम रद्द करने का दबाव क्या बढेगा?

ऐसे बहुत सारे मुद्दे हैं जिनसे पाकिस्तान का सीधा सीधा संबंध है - सबसे बडी बात ये की पाकिस्तान का आम युवा जब तक अपने भविष्य को ले कर आशान्वित नहीं है तब तक कुछ भी नया और अलग होने की संभावना नहीं बनती!

पाकिस्तान के लिये कुछ भी आसान नहीं रहा और आगे भी राहें आसान नहीं लगतीं.

चित्र साभार [Thanks to Cox and Forkum]  

http://www.coxandforkum.com/archives/000788.html 

 :)

Popularity: 16% [?]


post इसे कहते हैं ’माईंडब्लोंईंग’

 Votes | Average: 0 out of 5 Votes | Average: 0 out of 5 Votes | Average: 0 out of 5 Votes | Average: 0 out of 5 Votes | Average: 0 out of 5 (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...
Popularity: 23% [?]

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

इसे कहते हैं ’माईंडब्लोंईंग’

अलग अलग स्थानों पर पले बढे दो अजनबी - एक स्त्री और एक पुरुष मिलते हैं - एक दूसरे में अनोखा आकर्षण और आश्चर्यजनक समानताएं पाते हैं और शादी कर लेते हैं. बाद में उन्हें यह पता चलता है की वे तो जुडवां भाई-बहन हैं! दोनों को बचपन में अलग अलग परिवारों द्वारा गोद लिया गया था और ये सत्य उन पर कभी ज़ाहिर नहीं किया गया था की उनका कोई जुडवां भी है.

 सत्य का पता चलने पर अब वे कानूनन तलाकशुदा हो गए हैं लेकिन दत्तकों से जुडी संस्था में कार्यरत लोगों नें इस प्रकार बचपन में बिछडों में मिलने का ऐसा दैव और परस्पर आकर्षण होने की और भी पूर्व घटनाओं का ब्यौरा दिया है! सत्य का पता चला कैसे यह बात और दोनो की जानकारी ब्रिटेन के अधिकारियों द्वारा गुप्त रखी गई है!  

बचपन में बिछडनें वाले बताते हैं की वे यूं संयोग से अपने भाई/बहन से मिलने पर एक अभीभूत कर देने वाली भावनात्मक तीव्रता महसूस करते हैं.

लेख बताता है की प्राकृतिक रूप से जन्में भाई-बहनों में ऐसा संबंध हो जाने की सांख्यिकीय संभावना कितनी कम है. वहीं दूसरी ओर  परखनली शिशु और वीर्यदान/कृत्रिम गर्भाधान द्वारा उत्पन्न बच्चों के भविष्य में अपने आधे भाई-या बहन से मिलने की संभावनाएं इसकी तुलना में सांख्यिकी के ही आधार पर उससे अधिक हो सकती हैं. इस प्रकार की घटनाओं के बाद दत्तक लिये जाने वाले बच्चों के अपने मूल माता-पिता के बारे में जानकारी होने या ना होने के अधिकारों का निर्णय कैसे हो इस पर बहस तीव्र होगी! अनुवांशिक बिमारियों के मद्दे नजर ये एक काफ़ी पेचीदा जिरह हो सकती है.

ये खबर पढ कर सोचता रहा की भाईयों बहनों से अनुवांशिक बंधन का स्तर क्या है? आत्मिक, दैविक, स्वाभाविक ये सभी या और भी क्या क्या!  आजकल देसी मीडिया में ’माईंडब्लोंगिज’ विशेषण ज़रा ज्यादा खुल कर प्रयोग किया जाता है - लेख की कडी दे रहा हूं .. आप भी पढिये ये खबर और लेख सचमूच लगा “माईंडब्लोंईंग”.

Popularity: 23% [?]


post बेनज़ीर की हत्या यानी पश्चिमी मीडिया के हैप्पी हॉलीडेज़!

 Votes | Average: 0 out of 5 Votes | Average: 0 out of 5 Votes | Average: 0 out of 5 Votes | Average: 0 out of 5 Votes | Average: 0 out of 5 (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...
Popularity: 26% [?]

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

३० दिसम्बर २००६ को सद्दाम की हत्या की गई थी; २७ दिसम्बर २००७ को बेनज़ीर को निपटा दिया गया! इस क्रिसमस और नये साल की छुट्टियों के बीच तीन दिनों में किये जाने वाले सनसनीखेज़ कामों की टाईमिंग बडी जानदार है. ठीक पिछले साल जैसा माहौल बना दिया गया है. इस मौसम में कोई भी टीवी नही देखता, घूमना-फ़िरना, शॉप्पींग-वॉप्पींग सैंटा-फ़ैंटा यू नो! ऐसे में घर में कोई लफ़डेवाली खबर बना सकते नहीं तो बाहर ही सही! ये अपनी कांस्पीरेसी थ्योरी है! 

अपने देश के हालात बदलने के लिये लालयित, जनता में लोकप्रिय  पश्चिमी मानसिकता वाली स्त्री पात्र के आतंकवादियों द्वारा मार दिये जाने की खबर, फ़िर उसकी लगातार जुगाली - आपको साल के सबसे आनन्ददायक समय में ये याद दिलवाने के लिये, की आपके अमरीका के बाहर की दुनिया कितनी सडी जगह है, और आपको कितना भयभीत रहने की जरूरत है. ये याद दिलवाने के लिये की आपके धर्म के लोग कितने सहिष्णु हैं और बाहरी दुनिया कितनी हैवानियत से भरी पडी है. “थैंक गॉड फ़ार अमेरिका” जपो की आप का एक और साल सहीसलामत निपट गया और टीवी बांचो.    

बहरहाल बेनज़ीर जैसी अवसरवादी औसत राजनेता की मौत को शहीदी जामा पहनाना मुश्किल है लेकिन उसे बहदुर दिखाने की कोशिशें हर हाल में जारी हैं. कैसी समझदार महिला थी! पाकिस्तान में अस्थिरता और अरफ़ा-तरफ़ी की स्थिती बनी रहेगी - चुनाव आगे बढाए जाएंगे आदी इत्यादी - अमेरिका के दोस्त इस देश की किस्मत में हैप्पी या अनहैप्पी कोई भी ऐंडिंग नही है! भारत को इससे सबक लेना चाहिए. 

चलते चलते ये वीडियो देखिये जिसमें ये ही मोहतरमा बेनज़ीर कश्मीर के हर मुसलमान स्कूली बच्चे बच्चे को “आज़ादी” के लिये मरनेमारने पर उकसा रहीं है! ये वही बेनज़ीर हैं जो कुछ दिन पहले मुशर्रफ़ के राज में मदरसों के आतंवकादियों के गढ बन जाने पर कोस रही थीं.. हाऊ क्यूट!!

 

Popularity: 26% [?]

Older Posts

इन्टरनेट कमाई की खातिर हॉलीवुड के लेखक सड़क पे!

Close
E-mail It

आवाजाही