मेरी प्यारी,
बहुत दिन हुये तुमको खत न लिखा। आज मन किया। सोचा तुमको खत लिखा जाये। वैसे लोग कहते हैं कि खत लिखने का जमाना चला गया। क्या ऐसा है? मुझे यह लोगों की फ़ैलायी गयी अफ़वाह लगती है। जो कर नहीं पाते उसी के लिये उड़ा दिया कि उसका जमाना चला गया। ऐसा होता है कहीं! बताओ भला।
तुम मुझे बहुत याद आती हो। बहुत टाइम बरबाद करती हो। जब कोई जरूरी काम कर रहे होते हैं टप्प से याद आ जाती हो। काम हराम हो जाता है।
कुछ लिखने से पहले शुरुआत तो कर लें। तो शुरू इस सच के साथ करता हूं कि तुम मुझे बहुत याद आती हो। बहुत टाइम बरबाद करती हो। जब कोई जरूरी काम कर रहे होते हैं टप्प से याद आ जाती हो। काम हराम हो जाता है। गैरजरूरी काम के समय तो खैर याद आना लाजिमी है। सोचते हैं कि इस बेहया काम से अच्छा तो तुम्हारा नाम है। साथ है।
मुझे पता है कि तुम यह सच पढ़ते ही सबसे पहले यही कहोगी- क्या हसीन झूठ है। मुझे सब पता है लेकिन तुमको भी यह पता है ही कि यह सच है। इसी भरोसे के कारण इस बात पर फ़िजूल टाइम खोटी नई करने का!
तुमने मुझे पत्र नहीं लिखा लेकिन शिकायत अवश्य करती हो -अब तुम बदल गये। वो वाले नहीं रहे। मुझसे वैसी मोहब्बत नहीं करते जैसी पहले करते थे।
अब बताओ इस बात का कोई जबाब है? किसी के पास! हम इसका क्या जबाब दें। बताओ।
किसी बड़का शायर शायद फ़ैज साहब ने लिखा है- मुझसे पहले सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग! बस उसी का सहारा लेकर अपनी बात कहने की कोशिश करता हूं। आशा ही नहीं विश्वास है कि तुम मेरी बात समझोगी और तुम्हारी कम से कम मोहब्बत वाली शिकायत दूर जायेगी। इसके बाद बाकी भी हो ही जायेंगी।
चांद सितारे तोड़ना बहुत रिस्की काम है। जैसे ही एक ठो चांद तोड़ा सारी दुनिया का संतुलन बिगड़ जायेगा। सारे सितारे हमारी-तुम्हारी-इसकी-उसकी मतलब कि दुनिया भर की चांद पर टपक पड़ेंगे।
पहले हम तुम्हारे लिये चांद-सितारे तोड़ के लाने की बात कहते थे। तुम्हें शायद उनका ही इंतजार होगा। लेकिन इधर पता चला कि चांद सितारे तोड़ना बहुत रिस्की काम है। जैसे ही एक ठो चांद तोड़ा सारी दुनिया का संतुलन बिगड़ जायेगा। सारे सितारे हमारी-तुम्हारी-इसकी-उसकी मतलब कि दुनिया भर की चांद पर टपक पड़ेंगे। दुनिया की वाट लग जायेगी, खटिया खड़ी हो जायेगी। तुम ऐसा तो कतई नहीं चाहती होगी न! तुम्हारे मेंहदी लगे वालों पर बड़े-बड़े गढ्ढे वाले बेहवा, बेहया चांद की परछाई भी पड़े ये हमें मंजूर नहीं!
ओह, क्या लफ़ड़ा हो गया। हम मेंहदी तुम्हारे हाथ की जगह बालों में लगा गये। याद ही नहीं रहा कि बालों में मेहदी लगाना तुम अर्सा पहले छोड़ चुकी हो और अब डाई की शरण में चली गयी हो। पिछली बार जब बात हुयी थी तो लोरियल लगाती थी। बहुत मंहगी हो गयी अब तो लोरियल , आजकल कौन सी डाई इस्तेमाल हो रही हो?
तुमको जब भी याद करते हैं तमाम परेशानियां घेर लेती हैं। वैसे तुम अपने आपमें एक मुकम्मल परेशानी हो। तुम्हारे रहते किसी और परेशानी की जरूरत नहीं है। लेकिन मन मुआ बहुत चंचल होता है। सबर नहीं है। एक से मानता नहीं है। डिड्या है। हर तरह की परेशानी का स्वाद लेना चाहता है। ये भी परेशानी भी हो वो भी हो और वो तो हो ही। मतलब वही ये मे ले, वो में ले और वो हू में ले। किसी के पास कोई नयी परेशानी दिखती है, मन करता है ये हमारे कने भी हो। जब तक उसको हासिल नहीं कर लेते , मन मानता नहीं। इसी ‘संग्रहणी-वृत्ति’ ने तमाम आदतें जमा कर रखी हैं। जाम लग गया है।
तुम अपने आपमें एक मुकम्मल परेशानी हो। तुम्हारे रहते किसी और परेशानी की जरूरत नहीं है। लेकिन मन मुआ बहुत चंचल होता है। सबर नहीं है। एक से मानता नहीं है।
आजकल सबसे ज्यादा परेशान मंहगाई ने कर रखा है। तुमसे भी ज्यादा। बल्कि सच तो यह है कि ये मुई मंहगाई ही है जिसके चलते तुम फिर से अच्छी , बहुत अच्छी लगने लगी हो। भाव बेभाव हो गये हैं। आसमान छू रहे हैं। कभी -कभी तो हमें ये शेखचिल्ली ख्याल आता है कि जो दुनिया भर में आकाश पर्यटन पर लाखों-करोड़ों फ़ूंके जा रहे हैं उस फ़िजूल खर्ची से अच्छा कि जिसको आसमान पर भेजना हो उसको किसी जिंस के भाव पर बैठा दो। वो फ़्री में आसमान छू लेगा।
जैसे अब किसी को बहुत तेजी से आकाश छूना है उसको तेल के भाव पर बैठा दो वो झट्ट से आसमान पहुंच जायेगा। इसी तरह किसी को आलू के भाव पर , किसी को दाल के भाव पर, किसी को गेहूं के भाव पर बैठा दो। बैठने वाला फ़्री में आसमान छू लेगा। जब उतारना हो तो उसको मेहनत, ईमानदारी, कर्तव्य-निष्ठा जैसी कम कीमतों वाली चीजों पर बैठा दो। वो औकात में आकर जमीन पर धप्प से आ गिरेगा।
हमें पता है कि तुम कहोगी मेहनत, ईमानदारी, कर्तव्य-निष्ठा जैसी चीजें आकाश तक जायेंगी कैसे? यह हमारी भी चिंता है लेकिन यह भी सोचते हैं कि जब लाइका जैसी कुतिया आकाश के चक्कर लगाने जा सकती है तो ‘इन चीजों’ के भी दिन बहुरेंगे। कभी उदात्त माने जाने वाले इन गुणों को ‘इन चीजों’ इस लिये लिखा कि अब लोग इनको बहुत चिरकुट चीजें मानने लगे हैं। जब दुनिया ऐसा मानती है तो हम भी सार्वजनिक रूप से इनको दोहराने में हिचकते हैं। क्या जमाना आ गया है। जिसका जिक्र करने में फ़क्र करते थे उसका नाम लेने में शरमाते हैं।
पहले चिट्ठी में फ़ूल भेजने का चलन था अब इस खत में बताओ क्या भेजें? दो-चार ठो लवली वायरस भेजें? जो तुम्हारे कम्प्यूटर में पहुंचकर खलबली मचा दें। तुम्हारे दिल में हलचल मचा दें-हाय अब मेरे कम्प्यूटर का क्या होगा?
तुमको लिखना तो और बहुत कुछ चाहता था लेकिन समय मुआ लाठी लिये पीछे खड़ा है। कह रहा अब बस्स! बहुत हो गया। सो फिलहाल इतना ही। पहले चिट्ठी में फ़ूल भेजने का चलन था अब इस खत में बताओ क्या भेजें? दो-चार ठो लवली वायरस भेजें? जो तुम्हारे कम्प्यूटर में पहुंचकर खलबली मचा दें। तुम्हारे दिल में हलचल मचा दें-हाय अब मेरे कम्प्यूटर का क्या होगा? तुम बेशाख्ता कह उठो- मैं बेकार ही इस चिठेरे के बहकावे में आकर इसका पत्र बांचने लगी! ये चिठेरा तो कभी न सुधरेगा । न जाने कितने पैसे ठुक जायें इस कम्प्यूटर को सुधरवाने में। उसी समय वाइरस ठ्ठा के कहे- हहहहहहाआआहाहा…. मैं जानता था अब तुमको मुझसे ज्यादा अपने कम्यूटर से प्यार है। इसके बावजूद भी हम तुमसे उतना ही प्यार करते हैं जितना पहले करते थे। बल्कि कुछ ज्यादा ही। लेकिन दिखावे में पिछड़ रहे हैं। दिखावा बहुत मेहनत मांगता है । हम उत्ता मेहनती नहीं हैं। हम तुम्हारे आलसी आशिक थे, हैं और रहेंगे। लेजी लवर!
मुझे पता है तुम इस बचकाने आरोप से घबराओगी नहीं। तुरत चहकते-महकते-किलकते, थोड़ा इतराते और बहुत सा बल खाते हुये तुरत कहोगी- तुमने तो मुझे डरा ही दिया था। जरा भी बदले नहीं। हाऊ स्वीट!
मैं तुमसे दूर हूं, बहुत दूर! लेकिन ई दूरी बस एक ई मेल भर की दूरी है। झट से तय हो जाती है। इसीलिये आशा है और विश्वास भी कि जल्द ही मिलेंगे।
बकिया फिर, फिलहाल इतना ही,
तुम्हारा
प्यारा!
मेरी पसंद
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।
सहसा भूली याद तुम्हारी उर में आग लगा जाती है
विरहातप भी मधुर-मिलन के सोये मेघ जगा जाती है।
मुझको आग और पानी में रहने का अभ्यास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।
धन्य-धन्य मेरी लघुता को, जिसने तुम्हें महान बनाया
धन्य तुम्हारी स्नेह कृपणता, जिसने मुझे उदार बनाया।
मेरी अन्ध भक्ति को केवल इतना मन्द प्रकाश बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम विश्वास बहुत है।
अगणित शलभों के दल के दल एक ज्योति पर जलकर मरते
एक बूंद की अभिलाषा में कोटि-कोटि चातक तप करते।
शशि के पास सुधा थोड़ी है पर चकोर की प्यास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।
मैंने आंखे खोल देख ली हैं नादानी उन्मादों की
मैंने सुनी और समझी हैं कठिन कहानी अवसादों की।
फिर भी जीवन के पृष्ठों में पढ़ने को इतिहास बहुत हैं
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।
ओ! जीवन के थके पखेरू, बढ़े चलो हिम्मत मत हारो
पंखों में भविष्य बन्दी है मत अतीत की ओर निहारो।
क्या चिंता धरती यदि छूटी उड़ने को आकाश बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।
बलबीर सिंह ‘रंग’
बस यूं ही,
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