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टिप्पणी_ करी करी न करी

दो दिन पहले ज्ञानजी ने अपनी पोस्ट में लिखा- कल घोस्ट... 

टिप्पणी_ करी करी न करी

लिखने के स्वानुभूति होना जरूरी है- कृष्ण बिहारी

कृष्णबिहारी [आपने कॄष्णबिहारी... 

लिखने के स्वानुभूति होना जरूरी है- कृष्ण बिहारी

मैं कृष्णबिहारी को नहीं जानता - गोविन्द उपाध्याय

गोविंद उपाध्याय ठेलुहा,फुरसतिया... 

मैं कृष्णबिहारी को नहीं जानता - गोविन्द उपाध्याय

कोणार्क- जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है

कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।- रवीन्द्रनाथ टैगोर

पुरी कथा कहने के बाद हमें अगली पोस्ट में कोणार्क वर्णन करना था। छह माह से भी ज्यादा हो गये वह अगली पोस्ट न लिखी जा सकी। यह होता है यारों का वायदा निभाने का फ़ुरसतिया अंदाज!
शाम को हम [...]

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हम तुम्हारे पिताजी के दोस्त हैं

बहुत दिनों से हमारी साइकिल यात्रा के किस्से अटके हुये हैं। सिलसिलेवार लिखने के चक्कर में सब सिलसिला टूट जाता है। बहरहाल जबतक वह सिलसिला शुरु हो तब तक एक मुख्तसर सा किस्सा। इससे हमारी पोस्ट की लम्बाई से आक्रांत लोग भी चैन की सांस लेंगे और कहेंगे शार्ट एंड स्वीट।
हम अपने जिज्ञासु यायावरी की [...]

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टिप्पणी_ करी करी न करी

दो दिन पहले ज्ञानजी ने अपनी पोस्ट में लिखा-
कल घोस्ट बस्टर जी ने मेरी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं की। शायद नाराज हो गये। मेरा उन्हे नाराज करने या उनके विचारों से टकराने का कोई इरादा न था, न है। मैं तो एक सम्भावना पर सोच व्यक्त कर रहा था। पर उन्हें यह बुरा लगा हो [...]

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…वर्ना ब्लागर हम भी थे बड़े काम के

आलोक ने पिछलीपोस्ट में लिखा - हलकान यानी क्या? अग्रिम शुक्रिया।
अनिताजी ने तो टिप्पणी की शुरुआत ही इसका मतलब पूछते हुये की है - पहले तो हलकान का मतलब बता दिजिए, ये कानपुर सच्ची में जुमलों की नगरी है।
तो पहले तो अग्रिम शुक्रिया का हिसाब कर लिया जाये। अरविंद कुमार [...]

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दो दिन पहले ज्ञानजी ने अपनी पोस्ट में लिखा-
कल घोस्ट बस्टर जी ने मेरी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं की। शायद नाराज हो गये। मेरा उन्हे नाराज करने या उनके विचारों से टकराने का कोई इरादा न था, न है। मैं तो एक सम्भावना पर सोच व्यक्त कर रहा था। पर उन्हें यह बुरा लगा हो [...]

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मानस अनुक्रमणिका

दोस्तों की मदद से गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस नेट पर उपलब्ध कराई गयी है।
नेट पर जो लोग इसे देखते हैं वे समझते हैं कि हम लोग मानस मर्मज्ञ हैं। कुछ-कुछ जिज्ञासायें करते रहते हैं। एक सुझाव यह भी आया है कि मानस का सरल भाषा में अर्थ भी उपलब्ध कराया जाता तो अच्छा रहता।
पिछ्ले [...]

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पहिला सफेद बाल

[परसाईजी के लेखों की श्रंखला में आज पेश है उनका प्रसिद्ध व्यंग्य लेख- पहिला सफेद बाल। इस लेख में जो यौवन की परिभाषा परसाईजी ने बतायी है वह मुझे खासतौर पर आकर्षित करती है-यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तत्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का [...]

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ठिठुरता हुआ गणतंत्र

[आज गणतंत्र-दिवस है। इस मौके पर मैंहरिशंकर परसाईजीका लिखा अपनी पसंद का एक लेख पोस्ट कर रहा हूं- ठिठुरता हुआ गणतंत्र। यह लेख मुझे कई कारणों से पसंद है। आज के मौके पर जब समाजवाद की बातें भी होनी बन्द हो गयीं हैं और भूमंडलीकरण, मुक्त अर्थव्यवस्था के हल्ले में समाजवाद की आवाजें मध्यम [...]

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