उल्टी-चप्पल.. उल्टी-चप्पल.. चेत दावाग्नि चेत!
आपने कयामत से कयामत तक फ़िल्म का ये गीत तो सुना ही होगा
गज़ब का है दिन देखो ज़रा
ये दीवानापन देखो ज़रा
हम भी अकेले तुम भी अकेले
मज़ा आ रहा है..कसम से
भईये शुरु में ब्लागिंग का दीवानापन भी अकेले में अपनी साईट पर की जाने वाली चीज़ थी! हम भी अकेले तुम भी अकेले मज़ा आ रहा है कसम से वाला ही सीन होता था. सब भले वक्तों की बाते हैं.. उस जमाने में ज्यादा से ज्यादा मुरव्वत-खाते अपने ब्लाग के साथ अपनी पसंद वालों के ब्लागरोल ठेल दिये जाते थे - बाकी मेलजोल-गिरी एग्रीगेटर्स और टिप्पणियों के माध्यम से होती थीं.
हमनें अकेले-अकेले वाला मज़ा बरकरार रखा! हिंदिनी पर ब्लाग्स के पते, क्रास-लिंकिंग और थीम के माध्यम से हम ब्लागर्स को जुडे रखते आए हैं! अकेले-अकेले वाला मजा भी बना रहता है और साथ भी! (इसीलिये जब रवि भाई नें अपना अलग व्यवसायिक प्रयोग करने का मन बनाया तो कोई समस्या नहीं हुई - बस ताज़ा पता बदलने जैसा ही हुआ. आज भी हिंदिनी/रवि पर उनकी पुरानी रचनाएं पढने पाठक आते हैं.)
हिंदी ब्लागिंग में और भी कुछ अच्छे प्रयोग किये गए - जैसे आमंत्रण लेख, स्तंभ आदी! फ़िर जल्दी ही समूह-ब्लाग्स नामक दशाननों ने जन्म लिया.
कठोपनिषद में भी कह गया है -
सहनाववतु, सह नौ भुनुक्तु, सहवीर्य करवावहै
तेजस्वी नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै
अर्थात -
गुट बनाएं, एड चिपकाएं और साथ में वैचारिक हस्तमैथून करें
आपस में भिडने के बजाए साथ में दूसरों से पंगे लें
उपरोक्त ज्ञान से ग्रसित, समूह ब्लाग्स बडे मितव्ययी टाईप लोग बनाते हैं एक ब्लाग-साईट पर एकाधिक ब्लागर्स पेलमपेल कर रहे होते हैं - ये साझेदारी जब तक ब्लागर्स की वैचारिक समानताएं रहें तब तक तो तबले-तानपुरे जैसी जमती हैं लेकिन जैसे ही वैचारिक मतभेद होते हैं तीर-तलवार में बदल जाती हैं.
चूंकी संरचना के हिसाब से ऐसे ब्लाग का धड तो एक ही होता है, सिर अलग-अलग होते हैं और वे देश/काल/परिस्थिती के हिसाब से आपस में या तो प्रेमालाप या फ़िर सिर-फ़ुटव्वल करते हैं - जिसका किसी बाहर वाले से कोई लेना देना हो जरूरी नहीं है. लेकिन जनहित में इस से संबंधित सूचनाएं अन्य ब्लागर्स तक पहुंचाई जाती रहती हैं!
फ़िर मजेदार घोषणाओं और आम-सूचनाओं का दौर शुरु होता है -
“मेरा अब फ़लानें समूह ब्लाग से कोई लेना देना नही है!” जरूरी भी है की ऐसे [अ]सामयिक दलबदल/दलपकड/दलछोड/ह्रिदय-परिवर्तन आदी की सूचना सबको मिलती रहे!
हाल ही में एक नया ट्रैंड शुरु हुआ है - और वो है समूह-ब्लाग्स की आपसी झोंटा-नुचव्वल का! इस नये रिवोल्यूशनरी-च-इवोल्यूशनरी काम अर्थात क्रांतिकारी-उद्भव के
लिये हिंदी ब्लाग-जगत बधाई का और उपर वाले की दया का पात्र है!
समूह-ब्लाग्स की आपसी तू-तू मैं-मैं - डब्लूडब्लूएफ़ की नूरा कुश्तियों का समां बांध रही हैं!
ये मज़ा “हम भी अकेले - तुम भी अकेले” वाले मजे से कितना अधिक है. जी करता है कह दूं की आईये इस पावन हवन मैं हम भी आहुतियां दें और अपने जूते-चप्पल उलटा कर “चेत दवानी चेत” गाएं (जो लोग मालवा से हैं उन्हें याद होगा कैसे बचपन में दो की लडाई होने पर बाकी मजे लेने के लिये ये “टोटका” कर के पंगा भडकाते थे).. लेकिन नहीं .. मैं कुछ और कहना चाहता हूं ताकी जो अप्रिय लग रहा है वो ना ही होवे - सीधे सीधे बिंदूवार कह देता हूं-
- सबसे पहले तो समूह ब्लाग्स बनाने से ही बचें - अपने अपने ब्लाग्स अलग रखें और उन्हें चाहें तो ब्लागरोल य ब्लागनेटवर्क के माध्य्म से दूसरों से जोडें. इस प्रकार आप अपनी सोच और विचारधरा को समूह की छवि के [कु]प्रभावों से मुक्त रख सकेंगे!
- समूह-ब्लाग्स के सदस्य अपने लेख दो जगह [अपने ब्लाग्स और समूह ब्लाग्स] पर एक साथ न डालें - एग्रीगेटर्स पे स्पैमिंग का असर होता है.
- अगर आपको लगता है की आपके लेख समूह ब्लाग के अलावा मुहैया होने चाहिये तो हर ब्लागर को एक मुख्य श्रेणी बना दें और उसके लेखों का वर्गीकरण उप-श्रेणियों में करें! एक और फ़ायदा ये की अगर आप समूह से अलग हुए तो आपके माल को हटाना भी आसान रहेगा - और आपकी पुरानी कडियां भी आसानी से सहेजी/खोजी जा सकेंगी.
- उतना ही जरूरी ये भी है की आप कुकुरमुत्ते के समान ब्लाग पर ब्लाग उगाने और पचास जगह लिखने से भी बचें. कोई भी नामचीन ब्लागर सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी साईट पर लगातार लिख कर ही सफ़ल हुआ है.
- तो गाओ ओम शान्ती ओम!
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रेशमा का एक विंटेज युगल-गीत!
एक दूसरा प्रकार का आवलोकन ये भी है -