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ऋतु आई मतदान की री सखी!

शुभ प्रसंग है! दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज... 

ऋतु आई मतदान की री सखी!

अपशकुन: अमलीका बल्बाद हो जाएगा बेते!

सिग्नल,संकेत, इशारे,आसार साईन,चिन्ह,निशान,सुराग ओमेन(omen)/प्रिमोनिशन(premonition)... 

अपशकुन: अमलीका बल्बाद हो जाएगा बेते!

सचिन तेंडुलकर, अब बस कर!

कहते हैं की बहुत पहले, एक बार क्रौंच पक्षीयों... 

सचिन तेंडुलकर, अब बस कर!

पुस्तक अंश: ‘किताबी शिक्षा समय की बर्बादी है!’

“अधिकतर लोगों के लिये महाविद्यालय की पढाई समय की बरबादी है. ”

ये मैं नहीं कह रहा, कोई श्रीमान चार्ल्स मर्री कह रहे हैं. कौन चार्ल्स मर्री? मुझे भी नहीं पता लेकिन उनका यह लेख वाल स्ट्रीट जर्नल में छपा है और हाल ही में काफ़ी पढा गया और सराहा गया है, तो वे ज्ञानी जीव होंगे ऐसा मान लेने में कोई हर्जा नहीं है. और ये उनका लेख मात्र नहीं है -…

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भगवान भगवान ट्याँऽऽऊँ.. ऊँऽऽ …ओ दुनियाँ के रखवाले

बैजू बावरा में मो. रफ़ी के गाने “ओ दुनिया के रखवाले” के पार्श्वसंगीत में ट्याऊंऽऽऽ..ट्याऊंऽऽ..टूँऽऽऊँऽऽ..ऊँऽऽ

गली के आवारा पिल्ले को नुक्कड के पंसारी की लात पडते ही उसकी काऊंऽऽ..काऊंऽऽ…ऊँऽऽऽ..ऊँऽऽ

लोटपोट कॉमिक्स में रोते हुए मोटू-पतलू की बूऽऽऽहूऽऽहूऽऽहूऽऽ..

इन सभी में क्या एक सा है?

करुण रुदन और उसको दर्शाता एक दर्दिला साऊंड इफ़्फ़ेक्ट! ढेर सारे “ऽऽऽ” वाला!

ये सारे साऊंड इफ़्फ़ेक्ट एक साथ याद आ गये जब पढा की भारत के उच्चतम न्यायालय के आसन…

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ऋतु आई मतदान की री सखी!

शुभ प्रसंग है!

दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात!

इधर बराक ‘अलबेला सजन आयो री’ ओबामा उधर हिलेरी ‘हुई चोरी चने के खेत में’ क्लिंटन!

और रहे-सहे ‘अपनी तो ये आदत है के हम कुछ नहीं कहते’ ब्लागर्स!

सबकुछ चुनावमय हो रहा है री सखी!

अमरीका की तो छोड, भारत के अंग्रेजी चैनल इत्ते मनोयोग से  पूर्व-प्रबंध दिखा रहे हैं मानो राम लीला इहां नहीं उहां होने वाली है!  क्रय-विक्रय-पट क्या खुले, अमरीका भारत का माईबाप भया. उस रिश्ते से तो देव दर्शन का कर्तव्य बनता ही है.

कल…

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अपशकुन: अमलीका बल्बाद हो जाएगा बेते!

सिग्नल,संकेत, इशारे,आसार

साईन,चिन्ह,निशान,सुराग

ओमेन(omen)/प्रिमोनिशन(premonition) - शकुन अपशकुन

 कभी भरोसा किया है इन पर? या कम से कम औरों के भरोसे की हंसी ही उडाई हो?

अंधविश्वास कई बार अंधविश्वास कम होते हैं और खब्त/शगल/वहम अधिक! 

इसी सोच के चलते मुझे हल्के-फ़ुल्के अंधविश्वासों में एक किस्म का मनोविनोद या कौतुक दिखता है.

घर से निकलते छींक आ जाने पर एक मिनट बैठ के पानी पी के या फ़टाफ़ट इलाईची चबा कर उसका ‘निदान’ कर लिया जाता है.

स्कूल के ज़माने में कुछ बच्चे…

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ऐड्डी, हैरी और सिड भी टूंगते रह जाएंगे!

अगर आपने नोट ना किया हो तो बता दूं की ऐसा जबर्दस्त टाईटल लिखने में बहुत क्रियेटिविटी लगती है!

ऐडी, हैरी और सिड बोले तो कौन लोग?

आजादी के बाद, सत्तर के दशक तक देश के बच्चों नें रामपरसाद, घनश्यामदास जैसे नामों से राजेस,धर्मेन,जीतेन जैसे फ़िल्मी नामों तक का सफ़र तय किया. (जब किसी घटना की तारीख तय करना कठिन लगे, तो उसे पाठकों की औसत उम्र, याददाश्त और गप झेलने की सहनशक्ती के चलते बिंदास सत्तर के दशक में डाल देता हूं…

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बुद्धिजीवी कैसे बनें?

समस्या: बचपन में जब से अखबार में ये(बुद्धिजीवी) शब्द पढा, मैं बुद्धिजीवी होने को बेकरार था. लेकिन मेरे पास अधकचरे सफ़ेद बालों या टकली खोपडी जैसे “बेसिक इन्ग्रेडियंट्स” का नितांत अभाव रहा.. जिसके चलते मैंने बुद्धिजीवियों का करीब से निरीक्षण किया… मुझे लोगों का उनके पीछे लामबंद हो जाना और उनका इससे अपनी उदासीनता दिखाते शून्य में कुछ सोचते रहने का स्टाईल  प्रभावित करता रहा!  

१) विज्ञान के एक शिक्षक नें हमें ये बात बताई थी -

तब देश में बांध नए नए…

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प्रतिक्रियाएं जो टिप्पणियों में नहीं मिलतीं!

एक चिट्ठाकार पाठिका चैट कर रही थीं. वे कभी-कभी मेल और फ़ोन पर भी बात करती हैं.

इस बार मेरी छवि के लिये “चिंतित” दिखीं - “मुझे मालूम है आप कितना अच्छा सोचते हो और लिख सकते हो! मुझे मालूम है आपने शॉक वेल्यू के लिये नही लिखा होगा, लेकिन कभी-कभी आपका लिखा या शैली जंचती/पचती नहीं है!” कई दिनों से सोच रही थी आपकी क्लास लगाऊं!

तो मैनें कहा ठहरिये जरा दरी बिछा…

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अपरंपरागत(ऊटपटांग) हिंदी में साण्ड, सांड और साँड!

हाल ही की एक हवाई यात्रा में एक इज़राईली सहयात्री मुझसे बातचीत करने लगा. बताने लगा की उसके पुत्र की अपनी साफ़्टवेयर कंपनी है - वो स्वयं एक ’भारतीय’ बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे ओहदे पर है लेकिन काम अमरीका में करता है. उसनें एक सीधी साधी बात कही - भारत में संपन्नता और विपन्नता पर भाषा का असर है - आपको अंग्रेज़ी आती है तो आपके संपन्न होने या अधिक…

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ऋतु आई मतदान की री सखी!

शुभ प्रसंग है!

दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात!

इधर बराक ‘अलबेला सजन आयो री’ ओबामा उधर हिलेरी ‘हुई चोरी चने के खेत में’ क्लिंटन!

और रहे-सहे ‘अपनी तो ये आदत है के हम कुछ नहीं कहते’ ब्लागर्स!

सबकुछ चुनावमय हो रहा है री सखी!

अमरीका की तो छोड, भारत के अंग्रेजी चैनल इत्ते मनोयोग से  पूर्व-प्रबंध दिखा रहे हैं मानो राम लीला इहां नहीं उहां होने वाली है!  क्रय-विक्रय-पट क्या खुले, अमरीका भारत का माईबाप भया. उस रिश्ते से तो देव दर्शन का कर्तव्य बनता ही है.

कल…

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अपशकुन: अमलीका बल्बाद हो जाएगा बेते!

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साईन,चिन्ह,निशान,सुराग

ओमेन(omen)/प्रिमोनिशन(premonition) - शकुन अपशकुन

 कभी भरोसा किया है इन पर? या कम से कम औरों के भरोसे की हंसी ही उडाई हो?

अंधविश्वास कई बार अंधविश्वास कम होते हैं और खब्त/शगल/वहम अधिक! 

इसी सोच के चलते मुझे हल्के-फ़ुल्के अंधविश्वासों में एक किस्म का मनोविनोद या कौतुक दिखता है.

घर से निकलते छींक आ जाने पर एक मिनट बैठ के पानी पी के या फ़टाफ़ट इलाईची चबा कर उसका ‘निदान’ कर लिया जाता है.

स्कूल के ज़माने में कुछ बच्चे…

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ऐड्डी, हैरी और सिड भी टूंगते रह जाएंगे!

अगर आपने नोट ना किया हो तो बता दूं की ऐसा जबर्दस्त टाईटल लिखने में बहुत क्रियेटिविटी लगती है!

ऐडी, हैरी और सिड बोले तो कौन लोग?

आजादी के बाद, सत्तर के दशक तक देश के बच्चों नें रामपरसाद, घनश्यामदास जैसे नामों से राजेस,धर्मेन,जीतेन जैसे फ़िल्मी नामों तक का सफ़र तय किया. (जब किसी घटना की तारीख तय करना कठिन लगे, तो उसे पाठकों की औसत उम्र, याददाश्त और गप झेलने की सहनशक्ती के चलते बिंदास सत्तर के दशक में डाल देता हूं…

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एक चिट्ठाकार पाठिका चैट कर रही थीं. वे कभी-कभी मेल और फ़ोन पर भी बात करती हैं.

इस बार मेरी छवि के लिये “चिंतित” दिखीं - “मुझे मालूम है आप कितना अच्छा सोचते हो और लिख सकते हो! मुझे मालूम है आपने शॉक वेल्यू के लिये नही लिखा होगा, लेकिन कभी-कभी आपका लिखा या शैली जंचती/पचती नहीं है!” कई दिनों से सोच रही थी आपकी क्लास लगाऊं!

तो मैनें कहा ठहरिये जरा दरी बिछा…

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